अनंत की पुकार | क़िस्सा नंबर आख़री : दिल्ली दूर नहीं!

क़िस्सा नंबर 7 : देहरादून!

घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, राजाजी का एरिया शुरू हो जाता है। ये पता करना आसान इसलिए है क्योंकि कदम-कदम पर मंकी पीपल दिखते रहते हैं। ये वाला एरिया काफ़ी ठंडा रहता है, शायद दोनों तरफ जंगल, और सूरज के वहाँ होने का समय कम है इसलिए। पर उफ़्फ़! क्या जीवंत हवा थी यार! और मख्खन सड़क तो है ही। यहाँ वाहनों की गति सामान्य से थोड़ी ज़्यादा ही थी। बहुत गाड़ियों को अपुन ने बोला “ब्रो आप ही जाओ, हमारा क्या है, हम तो फ़कीर….” अरे ऐसा कुछ नहीं, बस कुछ अपशब्द कहे। अबे उन्होंने मुझे। अरे ऐसा कुछ नहीं हुआ था भई ! पर ये सब ड्रामा देख कर एक मंकी पीपल गुस्सा हो गया और अपुन से आगे वाली बाइक को रोकने का असफ़ल प्रयास किया, और मेरा नंबर आने तक उन्होंने ऑलमोस्ट गिव अप कर दिया। फिर वो जंगल में सड़क वाली बात याद आयी। 

अच्छा, यहाँ से, आई मीन, सहारनपुर रोड पर एक ऐसा अनोखा अनुभव शुरू हुआ जो बिजनौर रोड तक बार बार आया, सीख में भी और काम भी। भारी वाहन के बगल में गुज़रते ही ऐक्टिवा हवा के वेग से उड़ी ही जाती थी। स्पीड मैनेजमेंट कर के अपुन ने सीन सोर्ट किया। मोहनपुर, या जाने ऐसा ही कुछ नाम था हाइवे पर एक जगह का, जहाँ पे पेट्रोल भरवाया, और मुज़फ्फरनगर आ गए। रास्ता कुछ ऐसा बना, गूगल भैया के बताए, कि जाने कौन सी नई सड़क (दिल्ली वाली) टाइप मार्किट में घुसा दिया। चलो, इसी बहाने मुज़फ़्फ़रनगर के दुबारा दर्शन हो गए। आख़री प्रणाम भी कर आए। अब चौराहे पर आंटी की दुकान पर चाय ब्रेक कर लिया जाए। यहाँ से दो रास्ते दिल्ली जाते हैं, एक वाया मेरठ, और दूसरा वाया बिजनौर एंड बड़ौत। चूंकि मेरठ वाले से अपन आए थे, और चौराहा क्रॉस कर ही लिया था, तो अपन ने पहले वाला रास्ता फ़ाइनल किया, बड़ौत वाला। 

“आंटी चाय मिलेगी ?”  

“हाँ मिलेगी न बेट्टा“, और मेरे अलग कोने में खड़े रहने को देख कर उन्होंने कुर्सी वहीं ला दी धूप में।

“आंटी यहाँ पीछे मार्किट में समोसे की खुशबू आ रही थी, मेरा वैसा ही कुछ खाने का मन कर रहा, आपके पास कुछ मिलेगा?”

“समोसा खाना है बेट्टा?” कह कर उन्होंने एक लड़के को आवाज़ लगा कर समोसे मंगा लिए। “अरे बेट्टा, राहगीर को जो खाना हो और आसपास में किसी के पास भी मिलता हो तो मंगवा कर दे देत्ते हैं, दूसरे की भी कमाई हो इस बहाने तो बढ़िया है”। ऐसा लगा कि पूरी क़ायनात अपुन को समोसे खिलाने के लिए साज़िश कर रेली है। पर अपने कॉम्पिटीटर के लिए ऐसा भला सोचना? इस बात पर तो मुझे भोत गुस्सा आया! ऐसे थोड़े न होता है!  आंटी का मयिका नजफ़गढ़ (दिल्ली) का निकला, और कुछ इधर उधर की बातें कर के, चाय समोसा खा कर उनसे भी विदा ली।

अब हमारे आगे के साथी थे गन्ने के खेत और ईंट बनाने वाली भट्टियाँ। और तो और बीच-बीच में गुड़ के पकने की ऐसी खुशबू आ रही थी, कि लालच तो बड़ा हुआ पर हो कर भी कम ही हुआ। इस रोड पर भारी वाहन और हवा का ड्रामा खूब देखा। वैसे, अब तक सब जगह ज़्यादातर ठीक ड्राइवर्स ही मिले हैं अपुन को। दिल्ली वालों को सब ठीक लगेगा जी। अच्छा और बात-बात में एक ड्राइवर दूसरे को “bbk, bc” टाइप के स्वीट प्रोपोज़ल भी नहीं दे रहा। क्या ये मेरा भारत वर्ष है ? डाउट तो नहीं, शक ज़रूर हुआ।


“अब यार, जाम नहीं मिलना चाहिए, नहीं तो रिहर्सल को लेट हो जाएँगे”, सोच कर कहीं ब्रेक न लिया। और दिल्ली के नज़दीक आ ही गए। पता कैसे चला, मालूम है? जानलेवा सड़कों ने हमारा स्वागत किया भई। और धूल ने भी, और अँधाधुन ड्राइविंग, और हॉर्न की आवाज़ें। जब सामने बोर्ड देखा, “वज़ीराबाद” राइट, “शास्त्री पार्क” सीधे, तब लालची ख़याल आया कि यार माँ के घर चली जाती हूँ, रिहर्सल के लिए अभी और पच्चीस किलोमीटर जाना होगा, और फिर उनको अचार और गंधक जल भी तो देना है! पर देखो भई, एक बार जो अपुन ने कमिटमेंट कर दी तो फिर हम अपनी भी नहीं सुनते, बाकी सब की सुन लेते। गानों पर फ़ोकस कर के, स्टूडियो पहुँचे और धूल वाला मेक-अप पानी से धो कर, #प्याज़_चटनी फ़िल्म की टीम को प्रणाम किया। “देरी के लिए माफ़ी चाहती हूँ, रास्ते में थोड़ा जाम था”।

अपने साथ बस तीन कलियाँ लाई थी वहाँ से, जो कि स्वतः ही गमले में गिर गई थीं। ऐक्टिवा की डिक्की में अचार के डब्बे में से तेलम तेल होने के कारण वो न बच पाईं। बड़ी प्यारी थीं, फ़ोटू देखना।

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