अनंत की पुकार | क़िस्सा नंबर 7 : देहरादून!

क़िस्सा नंबर 6: हू इज़ देयर?

संक्षिप्त में बताया जाए तो देहरादून में बहुत मज़े किए, बात कर के भी, और चुप रह कर भी। और दीदी और भैया के हाथ के पकवान खा कर आत्मा भी प्रफुल्लित हो उठी। मैं घर के दो लोगों से लगभग बीस साल बाद मिली, और तीसरे से भी काफ़ी सालों बाद। लोग कहते हैं न, “लिविंग इन द मोमेंट” – ऐसी ही रही हमारी मुलाक़ात। न पीछे का, न आगे का कुछ बतियाया गया, बस जो अभी सामने था, उसी की बात हुई। जैसे कि भैया के हाथ के बने भांति भांति के अचार, फूलों और फलों के गमले, तीन साल के पड़ोसी महाशय की कलाकारियाँ, फ़ोटोग्राफ़ी, और फिर चाँद तो है ही। 

अगले दिन शाम को हम लोग भैया की गाड़ी में दो जगह गए: सहस्त्रधारा और दूसरी जगह जहाँ शिव मंदिर भी है और संतों का ध्यान स्थल रहा है। सहस्त्रधारा छोटी छोटी प्राकृतिक गुफाओं और जल स्त्रोतों से भरा हुआ है। जादुई ढंग से पानी गिरता है ऊपर से, और नीचे की तरफ़ भी पानी बहता है, जो सब काफ़ी साफ़ था। लड़का लोग एक कुंड में मस्त नाहा रेले थे। और स्त्रियाँ मंदिर और झरने निहार रही थीं, और फोटू खिचा रही थीं। जिस रोड से यहाँ आते हैं, वहीँ एक तरफ़ बुद्धिस्ट मंदिर भी है, क्यूट सा, जहाँ अपन नहीं जा पाए (#समय_का_अभाव)

यहाँ छुपे हैं छोटी गुफ़ाएँ और झरने
जानकारी वाला इकलौता बोर्ड
क्यूट है ना?

नेक्स्ट जगह है शिव मंदिर, और प्रख्यात है स्वामी विवेकानंद और उनके मित्र स्वामी तुरियानन्द जी के मिलन स्थान के रूप में, जहाँ तुरियानन्द साहब ध्यान किया करते थे। बताते हैं कि तुरियानन्द जी का ध्यान स्थल थोड़ा ऊपर जा के है, पर उसको प्रोटेक्ट करने के लिए उसको मार्क नहीं किया गया है, और अब कोई नहीं जाता उधर। यहाँ पर एक प्राचीन बाओली भी है, और गंधक का पानी बहता है, जो कि इंसान के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। बीमारियाँ भी ठीक करता है। ऐसा भैया ने बताया। मैंने देखा कि लोग बाल्टी, कैन, बोतलें, जो मिला, सब ले आ रहे थे, और पानी ले जा रहे थे। एक दो अंकिल तो गाड़ी में एक साल का पानी तो ले गए होंगे कम से कम। बहुत से लोकल्स इस पानी का रोज़ पीने में प्रयोग करते हैं। हमने भी तीन बोतलें भर लीं, तीन अलग डेस्टिनेशन के हिसाब से। ये जगह इसलिए भी याद रहेगी, क्यूँकि हमारे परिवार में फोटू खींचने का जूनून बड़े भाईसाब में सबसे पहले था, जो कि इस बार भी उन्होंने “हेंस प्रूव्ड” किया, ढाई करोड़ फोटू खींच कर। यहाँ से बस घर आ गए, रास्ते में बहुत सारे आश्रमों को निहारते हुए। 

ये है मंदिर कैंपस, गंधक पानी वाला स्थान, वगैरह वगैरह

वापस आने के बाद कुछ घंटे शानदार रहे, और मैं हमेशा कृतज्ञ रहूँगी। मेरे पिता के बड़े भाई, जिनकी उम्र अस्सी से ज़्यादा है, मौन रहते हैं, जब तक उनसे कुछ बात न की जाए। और उस क्षण की बात बता कर फिर चुप। पर कुछ ऐसा संयोग हुआ, कि वो बोले, और फिर बहुत देर तक बोलते रहे। अपने बचपन की बातें, अपने दादा की बातें, वगैरह वगैरह। सब बातें तो मज़ेदार थी हीं, पर उनको देखना ही शीतलतापूर्ण था। मुझे याद नहीं कि आखरी बार कब एक साधारण गृहस्थ इंसान को संत रूप में देखा हो। इस बात पर बहुत कुछ महसूस हुआ पर बोरिंग हो जाएगा, तो लिखते नहीं। एक ऐसा मनुष्य जिसने जीवन का सार समझ लिया है, और दूसरों की समझ के मार्ग में अच्छे या बुरे ढंग से नहीं आता। ईश्वर से उनका रिश्ता जाने क्या हो, पर उसकी झलक उनके होने में ही दिख जाती है। हाँ, चश्मे उतार कर देखना। नोट ये भी करना, कि उन्होंने “ज्ञान” का एक शब्द भी नहीं कहा, बस सरल सीधी बात, नहीं तो मौन, एक छोटे बालक की तरह। 

मैंने जी भर के अचार खाया, और पैक भी कर लिया। अगले दिन सुबह ही अपन दिल्ली के लिए निकले। “पहुँच कर बता देना”, दीदी ने कहा, और ताऊजी ने प्रणाम स्वीकार कर, “खुश रहो” बोला, और बड़े भाईसाब ने रास्ता बता कर रवाना किया। 

“शूट की मीटिंग/रिहर्सल न होती दिन में, तो और रुक जाती” सोच कर अपन ने ऐक्टिवा दौड़ा दी।

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