अनंत की पुकार | क़िस्सा नंबर 6 : हू इज़ देयर ?

क़िस्सा नंबर 5: और क्या ही चाहिए!

अभी याद आ रहा तो पूरी जर्नी का अभी बता रही, एक ऐसा अनुभव जो बार बार, हज़ार बार हुआ। मैं ऐक्टिवा चला रही हूँ, और अचानक मुझे बस हाथ दिखते हैं हैंडल पर, अपने ही, पर आँखें किसी और की हैं। मेरे कंट्रोल में नहीं है गाड़ी, पर सब ठीक है। दो तीन बार इस स्थिति में इतनी गहराई आ गई, कि बहुत एफ़र्ट लगा कर ख़ुद को लौटना पड़ा। इसको “who’s there”  स्टेट मान कर चलते हैं। 

अब अपुन टिहरी वाले रस्ते पर मस्त है। ट्रैफ़िक काफ़ी कम है इधर। थोड़ी देर में ही हाइवे टाइप सड़क ख़तम हो गई। अरे हाँ, एक पॉइंट से अपन ने जो नज़ारा देखा, राजाजी नेशनल पार्क के फैलाव का (ऐसा मुझे लगता है), वो अद्भुत था। और रास्ते में मंकी पीपल हमेशा साथ रहते हैं, राजाजी के सौजन्य से। अब जो रास्ता चल रहा उस पर मैंने जाना: 

  • अपना हाथ लेफ़्ट टर्न में कतई कम्फ़र्टेबल है, और राइट टर्न में थोड़ा वीक। 
  • अबे ऐक्टिवा के आगे वाले फ्रेम में ही दिक्कत है। 

पर वाहन कम होने के कारण आसानी ही रही। बाई गॉड, कुछ साल पहले की बात है, उत्तराखंड के पहाड़ों पर बस में बैठे बैठे मौत एकदम सामने नज़र आती थी। गंगोत्री का रास्ता अपुन को इसलिए हमेशा याद रहता है। और इसी डर से मैंने कभी यहाँ वाहन चलाने से तौबा कर रखी थी। पर अब जब यहाँ हूँ, सब सरल लग रहा, जैसे बंदा ही कोई और हो। दैट इज़ हाउ वी लर्न, क्यों ?

बीच बीच में ऐसे स्ट्रेच भी आए जहाँ ढलान तीखी थी, और रास्ता पथरीला, बजरीला। यहाँ जब आसानी से बात बन गई, तब अपन ने अपने साथ वाले बन्दे को थनैक्स कहा। कुछ देर बाद अपन जन्नत के दूसरे भाग में पहुँच गए। यार, यहाँ जंगल तो है ही दोनों तरफ़, हरे-हरे पेड़ों के साथ-साथ पुराने पत्ते झड़ कर अलविदा ले रहे और सड़क को सजा रहे। ऊपर से सूरज की किरणे छन कर आ रहीं, पेड़ों के बीच से। उफ़्फ़ !  कुछ देर यहाँ रुकी। ये जगह रानी पोखरी से कुछ किलोमीटर पहले पड़ती है। यहाँ जाना हर किसी के लिए रिकमेंडेड है। टोटल फ़िल्मी फ़ील नहीं है, उससे भी ज़्यादा रीयल है ब्रो! 

जादुई जंगल

रानी पोखरी आते ही फिर से हाइवे, और फ़टाफ़ट देहरादून वाले टोल पर पहुँच गए। अच्छा, यहाँ भी बीच में एक स्ट्रेच आता है, जो राजाजी का ही हिस्सा है। यहाँ खूब मंकी पीपल हैं, जिनकी फ़ोटू निकाली, और मख्खन सड़क की भी। इन चौड़ी सड़कों को देख कर बार बार ये ख़याल भी आता रहा कि जंगल के बीच में से सड़क निकाली है। सुविधा तो हुई, पर ये सुविधा का लोभ कितनी दूर तक जायेगा। कुछ दफ़ा बंदरों को रोड पार करने की मुश्किलों से जूझते देखा। इंसान की इनसेनियत की कोई सीमा नहीं है, अच्छा करने की सोचता है, पर उसके परिणामों से रूबरू नहीं है। हर कहीं दखल देने की आदत स्वाभाविक सी तो लगती नहीं। पर हर कोई, हर तरफ़ यही कर रहा। ओ एम् जी, इतनी बकवास करती है ये लड़की!

राजाजी की बाउंडरी पर मंकी पीपल राजाजी

अब हम देहरादून आ चुके हैं, और रास्ता फिर से ख़राब। ईवन राजपुर रोड भी घटिया हो रखी है। पर दिल्ली तो फिर दिल्ली है। रेलवे टेशन के पहले वाले चौराहे पर एक चाय ली, आंटी ने इतने प्यार से बनाई और दी। गन्ने के रस का मौसम सब जगह ज़ोर मारे पड़ा है। एक सज्जन के लिए अंकिल ज्यूस निकाल रहे, आंटी ने गन्ने ला कर दिए, और अंकिल ने आखरी गन्ने पर बोला “अरे छे गिलास बन जायेंगे इतने में, बड़े बड़े गन्ने हैं”, और आंटी मासूम बच्चे की तरह कुछ न बोल पायीं। मुझे अपनी माँ का एक्सप्रेशन याद आया, जैसा मेरे सामने हो जाता था कभी कभी। वैसे, ज्यूस पूरा उतना ही बना जितना सज्जन ने डिमांड की थी। 

सुविधाजनक सड़कें सोचने पर मजबूर करती हुई

अब हम अपनी देहरादून डेस्टिनेशन पर हैं। बड़े भाईसाब ने सहर्ष स्वागत किया, और दीदी को प्रणाम कर, अपुन नहाने को गए तुरंत। पता है, वो जो पत्थर रंगीन हो गए थे न, वशिष्ट गुफा के पास? उनका सबसे गहरा रंग इतना भीतर तक समा गया, कि अब तक सब गुलाबी दिख रहा है। अचरज भी हो रहा, और भीतर एक नाच सा चल रहा।

रोड पार करने की स्कीम बनाते मंकी पीपल
Facebook Comments

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *