Village Homes in Bhaderwah

अ वीकेंड ट्रिप टू भदरवाह – जम्मू का ‘मिनी कश्मीर’ | पार्ट 1 | बावरे बंजारे ट्रैवलॉग्स

तो दोबारा एक ट्रिप का सीन बना, इस बार फ़िर से जम्मू कश्मीर का।

जम्मू कश्मीर, लद्दाख रीजन के अलग हो जाने के बावजूद भी क्षेत्रफल के हिसाब से एक बड़ी वर्सटाइल यूनियन टेरिटरी है. पुरानी पुराण कथाओं से लेकर नई किताबों तक में आपको कश्मीर का जिक्र मिल ही जाएगा. कश्मीर के ज़िक्र के पीछे यहां का जो यूनिवर्सली एकनॉलेज्ड नैचरल ब्यूटी तो है ही, पर यहां के लोग, उनकी भाषाएं, उनका रहन-सहन इस जगह को सही में जन्नत बनाते हैं. कश्मीर के लोग सही मायनों में प्रकृति के धनी लोग हैं.
कश्मीर जन्नत जगह है, इसमें शक की कोई बात नहीं! पर, अगर ये कहें कि कश्मीर ही जन्नत जगह है, तो इस बात को पचाने में ज़रा दिक्कत आ सकती है और आनी भी चाहिए! क्योंकि, किसी ने सब कुछ थोड़ी ही न देखा है!

आरू वैली, कश्मीर

सीधी बात करें तो हमारा कहना है कि श्रीनगर शहर, गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम और लिद्दरवाट के अलावा भी जम्मू कश्मीर में जगहें हैं. पर हमेशा से ही कश्मीर के मसलों, मुश्किलों और इसके जन्नत के टैग के चलते यहां टूरिज़्म सिमट कर सिर्फ कुछ एक जगहों के लिए रह गया बस. यह वही कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर है, जो हिमाचल में टूरिज़्म बढ़ाने के लिए अपनाया गया. बस किसी एक जगह को टारगेट करके ‘फेमस’ कर दो और फ़िर वहीं भीड़ इक्कठा कर दो; जैसे कसोल और मनाली में! दिक्कत फ़ेमस होने से नहीं है, पर इस बात का अफ़सोस है कि हमारा सिस्टम इसके लोड को झेलने के लिए अब अभी तैयार नहीं है! टूरिज्म एक्टिविटीज़ के नाम पर भी सिर्फ सेलेक्टेड जगहें हैं. ‘पोटेंशियल – वाइज़’ देखें तो ऐसी जगहों की लंबी लिस्ट बन सकती है, पर काम केवल कुछ जगहों के लिए होता है. ऐसे ही अगर हम ट्रेकिंग की बात करें, तो सबसे पहले हिमाचल और उत्तराखंड का नाम आता है. क्यों, क्या कश्मीर में चढ़ने के लिए पहाड़ नहीं हैं? हैं न पर जब श्रीनगर, डल और गुलमर्ग से ही काम चल रहा है, तो दूसरी जगहों पर टूरिज़्म का पैसा क्यों जाए?

Sunset at Dal Lake by Bawray Banjaray
डल!

पर जम्मू कश्मीर में कश्मीर के सिवा और क्या देखें ?

यही तो आईरनी है जम्मू कश्मीर की, कि कश्मीर के नाम के आगे जम्मू होते हुए भी उसको कोई नहीं पूछता. इसी चीज़ का फ़र्क दोनों डिविज़न के टूरिज़्म एडमिनिस्ट्रेशन में भी दिखता है. यही सोचकर हमने जम्मू जाने का सोचा. अप्रैल 2018 की बात है. उन दिनों अपन लोग ऑफ़िस जाया करते थे. पर ऑफ़िस – लाइफ के साथ हमारी वीकेंड ट्रिप्स का सिलसिला लगातार चल रहा था. इससे पहले, नए साल पर, हम लोग हफ्ते भर पहलगाम, श्रीनगर और गुलमर्ग घूम कर आए थे. और नए साल वाले इस जश्न से पहले हम ग्रेट लक्स ऑफ़ कश्मीर ट्रेक भी कर आए थे.

जितनी बार कश्मीर घूमने गए, कसम से उतनी बार हम इस जगह के क़ायल हो कर आए. कश्मीर के नज़ारों ने हमको इस कदर मंत्रमुग्ध किया हुआ था कि अप्रैल का पहला वीकेंड और एक छुट्टी आते ही फिर जम्मू कश्मीर जाने का सीन बनने लगा. घूम कर आने के लिए अपने पास कुल 4 दिन थे. मतलब गुरुवार को निकल कर सोमवार सुबह तक हर हालत में वापस आना था. 

फिर हम कश्मीर सपनों में भी देखने लगे

सही बोलें, तो कश्मीर जाने आने के लिए यह बहुत कम टाइम था. अगर श्रीनगर तक भी जाते, तो चार दिन तो जाने-आने में ही लग जाने थे. फ्लाइट से जा रहे होते, तो अलग बात थी! पर अपने पास घूमने के तो पैसे थे, हवाई जहाज़ में उड़ने के नहीं। पंख समेट हमने सोचा कि क्यों न कोई ऐसी जगह देखें जो दिल्ली से कम दूर हो. कोई ऐसी जगह जहां जाएं तो थोड़ा टाइम बिता कर आ सकें. हमने गूगल मैप खोला और ऐसी ही एक जगह ढूंढने लगे जहां ज़्यादा हुजूम न लगता हो. जगह जब मिलती, तब मिलती, एक बात तो पक्की थी कि हमें जाना तो जम्मू कश्मीर ही था. और वहां पहुंचने के लिए पहला पड़ाव जम्मू था, इसलिए वक़्त न गवांते हुए हमने तुरंत जम्मू तवी की चार टिकट कटवा ली.

नक्शे में हमें कई सारे ऑप्शन दिखे, जहां हम वीकेंड के अंदर घूम कर आ सकते थे. हम लोगों ने जम्मू से कश्मीर की तरफ न जाकर किश्तवाड़ की तरफ़ निकलने का सोचा. इस तरफ हम नहीं गए थे. हालांकि इधर की कुछ फेमस जगहों, जैसे कि बटोत, पत्नी टॉप और डोडा डिस्ट्रिक्ट के बारे में सुना जरूर था पहले. हम लोग इन्हीं में से कोई एक जगह फाइनल करने में लग गए. कश्मीर आते-जाते इतने तो यार दोस्त बन ही गए हैं कि कश्मीर घूमने से जुड़ी सलाह मश्वरे की कमी अब महसूस नहीं होती. एक से दूसरे और दूसरे से चौथे तक बात पहुँचाते पहुँचाते हमारे पास भदरवाह नाम की जगह यहां के बाशिंदे रैना भाईजी का नंबर था. इससे पहले तक हमने यह नाम कभी नहीं सुना था. जगह कैसी निकलेगी किसी को नहीं पता था. पर थोड़ा सोच-विचार करने के बाद भदरवाह का सीन सेट कर लिया गया!

दिल्ली- जम्मू- डोडा पुल-भदरवाह – ट्रिप का सीन सेट था

भदरवाह की इस ट्रिप पर एक ख़ास बात और थी! सैंज से अपना भाई महेंदर उर्फ़ कप्तान जैक भी जम्मू कश्मीर ट्रिप का नाम सुनते ही, कोई दो दिन पहले, सैंज से दिल्ली पहुंच गया. उसके लिए यह ट्रिप तीन मायनों में मज़ेदार होने वाली थी. पहली कि माही पहली बार हमारे साथ हिमाचल से कहीं बाहर ट्रैवल करने वाला था, दूसरी कि वह पहली बार ट्रेन से सफ़र करने वाला था, और तीसरा यह की वह जम्मू – कश्मीर पहली बार जा रहा था. उसकी एक्साइटमेंट में हमारी ट्रिप मज़ेदार होने वाली थी. 

bawray Banjaray Team In Bhaderwah
दो ख़ुफ़िया बन्दे

एक बार जब ट्रिप बन जाती है तो टाइम दुश्मन सा लगने लगता है – या तो ख़त्म नहीं होता या ग़ायब ही हो जाता है और आपकी पैकिंग धरी की धरी. अपन लोग दिल्ली से आठ बजे वाली जम्मू तवी में किसी तरह चढ़ लिए. ट्रेन ट्रैवल तो होता ही एकदम कोज़ी टाइप, पता भी नहीं लगा और सुबह छः बजे से पहले हम लोग जम्मू रेलवे स्टेशन पर थे. यहां से भदरवाह जाने के लिए हमको पहले डोडा पुल पहुँचाना था, और  वहां से चेनाब नदी को छोड़, दाएं मुड़कर, डोडा- चम्बा हाईवे पर निकलना था.

डोडा जम्मू रीजन का सबसे बड़ा डिस्ट्रिक्ट है. जम्मू रेलवे स्टेशन से करीब 170 किलोमीटर दूर, ये जगह जम्मू कश्मीर के अनंतनाग, रामबन, किश्तवार, उधमपुर और हिमाचल प्रदेश के चम्बा डिस्ट्रिक्ट से बॉर्डर शेयर करता है. इस जगह का नाम आपने बेशक कम या न सुना हो, पर ये जगह टूरिज्म के नज़रिये से एकदम परफेक्ट और अंटच्ड गोल्ड है. और अगर डोडा गोल्ड है, तो भदरवाह को आप इस डिस्ट्रिक्ट का जेम कह लीजिए — मतलब यह कि गोल्ड जेम के बीच मात्र 33 किलोमीटर की दूरी है. 

जम्मू बस स्टॉप से पहले हमने भदरवाह के कोई डायरेक्ट बस देखी — अगर मिल जाती तो डोडा से नहीं बदलनी पड़ती. पर जम्मू से हमें डोडा के लिए ही बस मिली! जम्मू कश्मीर की लोकल बसों में घूमना जरूर बनता है. HRTC से एकदम अलग एक्सपीरियंस है. यहाँ की बसें, बसें कम, रंग बिरंगे, सजे हुए ट्रक ज़्यादा लगते हैं. और इनमें सफ़र करने वाले लोग, बस अब क्या ही बताया जाए! कितने खुशमिज़ाज़ और बातूनी हैं, इसका अंदाज़ा आपको “इंडियन टू कश्मीरी” मोड वाली कन्वर्सेशन से लेकर “अबे क्या फ़र्क पड़ता है, आप ये बताओ की इधर क’माल’ कैसे मिलेगा” तक में पता चल जाएगा! वैसे कश्मीरियत भी बहुत बात करती है – कभी आप किसी के घर जाकर कश्मीर देखना! दिक्कत यही है शायद कि ‘हमारी जमात’ फ़िर ‘सुन’ नहीं रही है! भाषाएं अगर बोली जा रही हैं, तो उनका सुना जाना बेहद ज़रूरी है. डोडा डिस्ट्रिक्ट में ही बोली जाने वाली भाषाओं में कश्मीरी, डोगरी, भदरवाही, सिरजी और पंजाबी आती हैं. डोडा से भदरवाह पहुँचते पहुँचते, हम लगभग ये सभी भाषाएं सुन चुके थे! डोडा से ही ट्रिप पर दो और लोग जुड़े! चिंता घाटी, जय घाटी, भदरवाह और पादरी पास तक हांडा गया!

कहानी का अगला हिस्सा ये रहा!

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