Bawray Banjaray on trek in the Himalayas

रेस्पोंसिबल ट्रेकिंग – क्या आप एक ज़िम्मेदार ट्रेकर हैं?

बर्फ़ गई और समय आ गया है पिछले साथ-आठ महीनों से बंद पड़े रस्ते, रोड्स, ट्रेल्स और ट्रेक्स के खुलने का. चटक धूप खिली है और सफ़ेद पाउडर का सूरज और चाँद के साथ नैन-मटक्का भी शुरू हो गया है. बर्फ़ भी उम्मीद से ज़्यादा मिली है, सो उसका भी इन रास्तों और ट्रेक्स पर अपना ही असर है. इधर परीक्षाएं भी ख़त्म होने वाली है, फिर आएंगी गर्मी की छुट्टियां और उत्तर भारत में शादियों के मौसम – आजकल लोगों का हनीमून ‘ट्रेक’ भी हो गया है! कुल मिलाकर देखा जाए तो उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में हर साल की तरह, हिमालय इस बार भी लाखों ट्रेकर्स और एडवेंचर सीकर्स के लिए बाहें फैलाए खड़ा है.

The scenic view fro the Chandrashila Submit

लेकिन इससे पहले कि हम भारतीय हिमालय में रेस्पोंसबिल ट्रेकिंग की बात करें, चलिए आपको इससे जुड़े कुछ फ़ैक्ट्स बताते हैं:

  • इंडियन हिमालयन रीजन (आईएचआर) भारत के नॉर्थ में कुल 2,400 किलोमीटर तक फैला हुआ है.
  • इसका एरिया लगभग 500,000 sq km है.
  • भारत के मैदानों और पहाड़ों में रह रही जनसंख्या के लिए मौसम, वाटर-सिक्योरिटी और रोज़गार आईएचआर पर निर्भर हैं.
  • आईएचआर वेस्ट में सिंध नदी (इंडस रिवर) से लेकर भारत के ईस्ट में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैला हुआ है.
  • हिन्दू कुश हिमालयन रीजन में कुल 6 देश भारत के साथ अपना बॉर्डर शेयर करते हैं. मतलब कुल 7 देशों की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आईएचआर पर डिरेक्टली या इंडिरेक्टली डिपेंडेंट हैं.
  • धरती के 27% एरिया में पहाड़ हैं. ये पहाड़ कुछ 720 मिलियन लोगों की ज़िंदगी को सीधे या परोक्ष तौर पर पालते हैं. यह दुनिया की लगभग आधी आबादी है.
  • आईएचआर का पहाड़ी क्षेत्र अभी कई समस्याओं से जूझ रहा है. इनमें वाटर इंसेक्योरिटी, इंसान और वाइल्डलाइफ के बीच के झगड़े, लैंड डीग्रेडेशन, माइग्रेशन (बहार और अंदर, दोनों), सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और एयर पॉल्यूशन मेन प्रोब्लेम्स हैं.
  • आईएचआर की वजह से चलने वाला टूरिज़म भारत की इकॉनमी में लगभग 8% का योगदान देता है. भारत के जीडीपी में यह योगदान कुछ US$ 71.5 बिलियन है.
  • मास टूरिज्म की भसड़ ने ट्रेडिशनल, इको-फ्रेंडली और खूबसूरत घरों और होटलों को बदल कर रख दिया है. नीति आयोग की मानें तो,

there is this replacement of traditional eco-friendly and aesthetic architecture with inappropriate, unsightly and dangerous construction, poorly designed roads and associated infrastructure, inadequate solid waste management, air pollution, degradation of watersheds and water sources, and the loss of natural resources, biodiversity and ecosystem services. Cumulatively, these are affecting long-term tourism development prospects in the IHR.

Must Read: 10 Tripping Routes In The Greater Himalayas For Road Trips.

बहुत हो गया किताबी ज्ञान!अब चलते हैं ट्रेक पर, पर उससे पहले  here are the tips for trekking responsibly in the Indian Himalayan Region or for that matter, anywhere! 

जान बची तो लाखों उपाय: बी सेफ़, ट्रेवल सेफ़र

पिछली बार की तुलना में इस बार बर्फ ज़्यादा गिरी है. मतलब ये कि जो रस्ते और ट्रेल्स आप अप्रैल 2018 में चढ़कर आए हैं, वो 2019 में वैसे नहीं मिलेंगे. अब देखा जाए तो ऐसे छोटे-मोटे चेंजेज़ हर साल ही होते हैं, बर्फ गिरने के बाद. और इस बार का तो आप देख ही चुके हैं. अभी तलक, इस साल कुछ दुर्भाग्यपूर्ण मौतें भी हो चुकी हैं.

तो सब से ज़रूरी बात ये कि पूरी तैयारी के साथ जाएं – कपडे लत्ते, औज़ार – हथियार और टेंट-टिकट की तैयारियां एक तरफ, ट्रेल और उस जगह की जानकारी एक बात! अगर आप ट्रेकिंग के शौकीन हैं, तो पूरी कोशिश करें की आपको अपने ट्रेक के आसपास का मौसम, ट्रेल की हालत और उसे पूरा कर सकने की आपकी कैपेसिटी का पता होना चाहिए. मतलब ये कि रेस्पोंसिबल ट्रेकर बनने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि आप सलामत रहें.

पानी: ब्रिंग बैक दोज़ प्लास्टिक बॉटल्स यू टुक टूद माउंटेन्स

Plastic waste in Indian Himalayan Region

पहाड़ों या ऐसे तमाम इलाके जहां आप ट्रेक पर जाते हैं, वहां पाया जाने वाला प्लास्टिक कूड़ा सबसे ज्यादा प्लास्टिक की बोतलों का होता है. नीति आयोग की एक रिपोर्ट की मानें तो 2017 में सिर्फ लद्दाख़ से लगभग लाखों टन प्लास्टिक बोतलें इकट्ठी की गईं.

Carry Bottles that you can bring back while trekking in the mountains

ब्लूटूथ स्पीकर लेकर ट्रेक पर जाने वाले फुच्चों से कई बार सुना है – “Is this safe for drinking?” सबसे पहली बात – पहाड़ों से बढ़िया पीने का पानी आपको कहीं नहीं मिलेगा। पूरा मिनरल वाटर वाला मामला होता है. तो आप ज़्यादातर ट्रेक्स पर चुल्लू बनाकर आराम से पानी पी सकते हैं. अब दूसरी बात ये कि जहाँ पानी नहीं मिलता वहां क्या? लाइटवेट बोतल साथ लेकर चलें। पानी के आखिरी सोते से पर्याप्त मात्रा में पानी स्टोर कर लें. वर्स्ट केस में अगर प्लास्टिक बोतल ले जानी भी पड़ गई तो, वापस ज़रूर लेकर आएं. ऐसी जगहों में कूड़ेदान में भी प्लास्टिक डंप करना कोई समाधान नहीं होता।

खाना: से नो टू इंस्टैंट नूडल्स

Maggie is one of the most popular things to eat in the mountains

देखिए अगर सही में ट्रेकिंग कर रहे हैं तो आपके पास पैकेज्ड फ़ूड होगा या आप लोकल ढाबों या घरों से मिलने वाले खाने पर निर्भर होते हैं. आजकल के फ़ैशन में मैगी और दूसरे झटपट तैयार होने वाले नूडल्स की डिमांड का कोई ओर-छोड़ ही नहीं है. दिक्कत नूडल्स खाने से नहीं है! मतलब तो आप समझ ही गए होंगे। जी, प्लास्टिक के रैपर्स! बाकी हमें कुछ कहने की ज़रुरत है नहीं।

रहना: ब्रिंग योर ओन टेंट, यूज़ मोबाइल टेंट्स

Permanent tents in Spiti are a big menace in the Indian Himalayan Region

कभी भी किसी भी ट्रेक पर परमानेंट टेंट नहीं लगना चाहिए. परमानेंट टेंट का मतलब है ह्यूमन सेटलमेंट और उससे इकट्ठा होता है कूड़ा. ऐसी परमानेंट टेंट्स आम तौर पर काफी ऊंचाई पर होती है और जिनके ये टेंट्स होते हैं, ज़्यादातर लोग इस बात का ध्यान नहीं रखते. हालाँकि जैविक कचरा ख़त्म तो हो जाएगा, पर इतना ज़रूर है कि अपनी हिस्से की गंदगी ज़रूर फैलाएगा – ठीक वैसे जैसे आपके घर के डस्टबिन में जब कूड़ा सड़ता है. और इसके अलावा जो प्लास्टिक और दूसरे नॉन-बायोडीग्रेडेबल कचरे तो हैं ही.

इन सब दिखाए देने वाले कचरों के अलावा ऐसे कई और फ़ैक्टर्स हैं जो परमानेंट टेंट वाली जगहों के आसपास के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं – लैंड ईरोजन से लेकर डीफोरेस्टेशन तक!

गाइड: लोकल एम्प्लॉयमेंट है तो सस्टेनेबिलीटि है!

A local guide on trek to Himalayas

किसी जगह के बारे में वहां के बाशिंदों से बेहतर कोई नहीं जानता. तो बेहतर है कि आप किसी लोकल गाइड की मदद लें. हालाँकि ये ज़रूर ध्यान रखें कि एडवांस लेवल ट्रेक्स के लिए प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ती है और इसलिए आपके गाइड के पास एक वैलिड सर्टीफ़िकेट ज़रूर हो, चाहे वो लोकल हो या कहीं और से!

पोर्टर – कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और आप तो दुनिया देखने निकले हो!

Porters on trek to Tarsar Marsar Lake
किसी भी ट्रेकिंग ग्रुप में पोर्टर्स का पे सबसे कम होता है. वैसे एक लेवल से देखा जाए तो सबसे ज्यादा फिजिकल लेबर यही लोग करते हैं. तो आपर इनके पे का तो शायद कुछ कर नहीं सकते, पर हम ये ज़रूर ध्यान रख सकते हैं कि ये भी हमारे साथ की ट्रेकिंग का मज़ा लें – बराबरी से, उनके हिसाब से! खाना भी हम साथ खा सकते हैं. अगर टेंट में सोने की जगह न हो और उसको वजह से किसी पोर्टर को बहार सोना पर रहा हो (हम भुगत छुटे हैं) तो एक बार कम से कम पूछ ज़रूर लेना चाहिए. वैसे इनलोगों के पास आपको सबसे सुन्दर कहानियां मिलेगीं.

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और एक बात – अक्सर लंबे ट्रिक्स पर इंसानी पोर्टर्स के साथ जानवर भी चलते हैं. पैकेज बनाने वाले लोग ‘पोनी पोर्टर’ भी बोलते हैं आजकल. अगर आप सही मायनों में दुनिया देखने निकले हैं, अगर आप अपनी ट्रेकिंग और यात्राओं के दौरान कुछ सीखना चाहते हैं तो शुरुआत आप यहीं से कर सकते हैं – ये समझने कि की न तो कोई काम छोटा या बड़ा होता है न ही उस काम को करने वाला. ये जानवर, अक्सर इनके मालिकों कि अनअवेयरनेस का शिकार होते हैं. मास टूरिज्म और हमेशा बढ़ रहीं डिमांड्स को पूरा करते-करते ये जानवर कई बार अक्सर ओवर-लोडिंग (वैसे ये शब्द किसी ज़िंदा जीव के साथ इस्तेमाल नहीं होना चाहिए) और भूख से त्रस्त रहते हैं.

ट्रेवल एजेंसी: बहुत ज़्यादा भसड़ मची हुई है, ज़रा ध्यान से!

किसी एजेंसी या ऑपरेटर की मदद से कहीं ट्रेक पर जाने में कोई दिक्कत नहीं है. आपकी अपनी चॉइस है! पर किसी भी ट्रैकिंग एजेंसी या ऑपरेटर को बुक करने से पहले ये काम ज़रूर करें –

ट्रेकिंग एजेंसी या ऑपरेटर का लाइसेन्स ज़रूर चेक कर लें. सस्टेनेबल ट्रेवल को लेकर वह एजेंसी कितनी जागरूक है, यह भी जानना आपके लिए ज़रूरी है.
वह एजेंसी जो भी गाइड या ग्रुप लीडर अप्पोइंट कर रही है, उनकी प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जानकारी ज़रूर मांगें.
ट्रेवल एजेंसी अपने ब्रोशियोर में जो डिटेल्स दे रही हैं, उनको दूसरी एजेंसीज़ से कंपेयर करें. अगर अंतर हैं तो वो क्यों है? देखिए कि कौन कितना कम बेवकूफ़ बना रहा है!
यह अरूर देखें कि आपको जो ट्रेकिंग पैकेज दिया जा रहा है, क्या वह मौसम और आपकी कैपेसिटी के हिसाब से है?

पिछले 4-5 सालों में कुछ ट्रेकिंग ऑपरेटर्स और एजेंसियों ने काफी भसड़ मचा रखी है. व्हीलचेयर एक्टिविज्म के नाम पर इन कंपनियों ने बिना ज़मीनी हकीकतों को समझे, इतनी सेंसेटिव जियोग्राफी को काफ़ी नुकसान पहुँचाया.

Shitt Bags dumped in oopen by India HIkes in Ladakh
Image Source : Tse Wang Dorjey

The route being mentioned in the issue is Chadar Trek route in Ladakh.

A quick approximation:
15 batches/season (actual data from India Hikes site ) with 17 clients on an average (15 – 20 members in India Hikes’ batches, data again from their site), and it’s a 6 day trek. Add at least 10 support staff for 17 clients (a minimal estimate, could be more also)

Total persons: 17 + 10 = 27 (which is overcrowding) considering each person uses one bag daily!

27 persons x 6 days x 15 batches = 2430 bags in a season dumped in pits in a trail in one season.

What if all trekking groups start using such bags, then we’ll have many times more shit bags dumped across all our pristine wilderness.

पहाड़ प्रेमी भाई को इस एक बार ज़रूर पढ़िए.

मनोरंजन: डोन्ट लेट द थिंग्स फॉल अपार्ट

Dehuri Mela in Sainj Valley, GHNP

गाना-बजाना, नाचना-कूदना, चिल्लम -गांजा, दारू-बियर एक तरफ, किसी जगह की सांस्कृतिक और प्राकृतिक हेरिटेज दूसरी तरफ. अगर आप एक रेस्पोंसिबल ट्रेकर हैं, तो आपको पता है कि आप किस तरफ हैं.
कसोल वाले फारेस्ट रेस्ट हाउस में अपन चैन की नींद सो रहे थे – पिछले कल खीरगंगा से लौटे थे. सुबह 6 बजे अचानक से तेज़ म्यूज़िक ने एकदम से डरा कर जगा दिया. बाद में पता चला कि इस माया नगरी कसोल से जुड़ा है छलाल. छलाल में इस समय कुछ  2-3अड्डे ही बने थे. और इन अड्डों के संस्थापकों और संचालकों ने इनके तंबुओं में सो रहे अपने कस्टमर्स  (guest) को जगाने के लिए डीजे वाले स्पीकर्स पर तेज़ आवाज़ में गाने चलने का नायाब आईडिया निकाला था

किसी जगह की ख़ूबसूरती उसकी सांस्कृतिक और प्राकृतिक लाइफस्टाइल होती है. आपको मनोरंजन के साधन चाहिए, आप अपनी स्पेस में उस जगह की कल्चरल हेरिटेज का सम्मान करते हुए इसका लुत्फ़ उठा सकते हैं. ज़रा सोचिए कि अगर किसी जगह को सिर्फ वहां मिलने वाले चरस या किसी और चीज़ के नाम पर जाना जाने लगे तो ये उस जगह और वहां के लोगों के साथ कितना बड़ा अन्याय है.

तो जी ये रहा हमारा मश्वरा! पढ़िए, सोचिए और ट्रेकिंग पर निकलने से पहले ये ज़रूर देख लें कि आप एक अवेयर और ज़िम्मेदार ट्रेकर हैं.

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