सोशल मीडिया की भसड़ – अ बावरे बंजारे पर्सपेक्टिव | बिंदास भड़ास

एक बात सोचिएगा! क्या आपने पढ़ना छोड़ सिर्फ देखना या सुनना तो शुरू नहीं कर दिया है?

उदाहरण के लिए, नीचे कुछ हमारी कुछ रिसेंट Facebook पोस्ट्स शेयर कर रहे हैं। ये पोस्ट्स फ़ोटोज़ के साथ ऑर्गेनिक पोस्ट हैं, कोई लिंक या शेयर्ड पोस्ट नहीं (ये जानकारी इसलिए ज़रुरी है ताकि सोशल मीडिया पंडित एल्गोरिदम की दुहाई न देने लग जाएं)।

अब बात ये है कि हम कॉन्टेंट क्रिएटर्स की आप सब फॉलोवर्स से एक छोटी से शिकायत भी है और आपके कॉन्टेंट कॉनज़म्पशन को लेकर चिंता भी। आपने हमारे लिए चीज़ें बेहद मुश्किल और चुटकी बजाने जैसा आसान बना दिया है। बेहद मुश्किल यों कि हम अपनी कहानियों की कीमत आपके लाइक्स और कमेन्ट्स से टैग करने लग गए हैं और आसान इसलिए कि आपका ध्यान पाने के लिए फोटोज़ में बस थोड़ा सैचुरेशन बढ़ाना होता है या कुछ कर्व्स दिखाने होते हैं – कुछ लाइक्स और शेयर्स पाने के लिए। इन पोस्ट्स में आपके लाइक्स और कॉमेंट्स का हिसाब किताब लगाईये एक बार!

हमारे इनबॉक्स में बातचीत के दौरान आप सब ने कई बार हमसे हमारा जेंडर पूछा है या अपने-अपने पूर्वाग्रहों से लैस होकर हमें “भाई” मान कर एड्रेस किया है और हर बार हमने आपको टोका है – “आप इतना श्योर कैसे हैं कि इधर से कोई ‘भाई’ ही बात कर रहा है” – क्योंकि कई बार ऐसा नहीं होता है! इस पर आपके रिप्लाइज़ में आपका मोमेंट्री डिसकॉम्फोर्ट भी हमें दिख जाता है। ये जानकारी इसलिए शेयर कर रहे हैं क्योंकि हम कॉन्टेंट क्रिएटर्स में एक द्वेष पैदा हो रहा है।

अगर आप बिहाइंड द सीन कुछ मुट्ठी भर सीरियस कंटेंट क्रिएटर्स को सुनेंगे तो आपको फीमेल जेंडर के कॉन्टेक्स्ट में उनकी क्लीवेज – कर्व्स और स्किन की इम्पोर्टेंस और एक्सप्लॉइट्स को लेकर एक सर्काज़्म दिखेगा। कभी कभी तो लालसा या बेहद डिप्रेसिंग अफ़सोस भी – कि क्यों वो ये सब नहीं कर पा रहे हैं।

अपने पोस्ट्स में हमने अपनी टीम की फ़ोटोज़ न शेयर करने का फ़ैसला लिया था – तमाम सोशल मीडिया हैंडल्स पर पहाड़ों की चटक फ़ोटोज़ जो भयानक कर्व्स से लैस होती हैं, उन पर लाइक्स, कॉमेंट्स और फ़ॉलोज़ देख कर। हमारी कोशिशों में हम इसपर आज तक क़ायम भी हैं। फ़ोटोज़ में लैंडस्केप या वो जगह या उसकी कहानी कम, ये लाइक कमेंट और फॉलो करने वाली भीड़ के आंखों की एक दबी हुई क्षुधा का जवाब देखकर हमें यही लगा कि कम से कम इस सामाजिक विकृति का भरण पोषण हम तो नहीं करेंगे।

और आप सोचिए कि इतनी विषमता क्यों है?

आपको बेवकूफ़ बनाया जा रहा है – आपके समय, आपके अटेंशन को कितना हल्के में लिया जा रहा है ये भी सोचिए। और ये भी सोचिए कि अगर ऐसा हो रहा है, तो आपके सामने से आपकी कहानियां ग़ायब हो जाएंगी और एक विकृत, डिस्टॉर्टेड मानसिकता जो आज हमारी सच्चाई बन गई है, उसकी आग इन कहानियों में आपके हीरो बनने के अधिकार को लील जाएगी। जी हाँ, किसी भी कहानी को पढ़ने वाला ही उस कहानी का असली हीरो होता है, कम से कम हम तो ऐसा ही मानते हैं!

सोचिएगा। हमारा क्या है, हम तो कहानियां बुनते रहेंगे। ऐसे ही।
आपके,
देसी ब्लॉगर्स,
बावरे बंजारे!

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