Art installations at Dwijing Festival

किस्सा ए दानाई – बोडोलैंड ट्रॅवलॉग | पार्ट 1

एक दो दशक का किसी भी सिविलाइज़ेशन पर क्या और कितना इफ़ेक्ट पड़ता है, इसका अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं कि दो डिकेड पहले तक कोई सोशल मीडिया साइट्स नहीं थी और ज़िंदगी बदस्तूर चल रही थी. पर अब तो बिना सोशल मीडिया के आप शायद अपनी लाइफ़ इमेजिन ही नहीं कर सकते। हाँ, हैं कुछ भतेरे जो अभी भी इससे बचे हुए हैं! काश के हम भी उनमें से एक होते। ख़ैर, Facebook पर इधर-उधर हांडते हुए हमें पता चला अम्बैसडर्स ऑफ़ बोडोलैंड प्रोग्राम के बारे में. यह प्रोग्राम क्या है वो आपको थोड़ी देर में समझ आ जायेगा। पर फ़ेस्टिवल को जानने से पहले फ़ेस्टिवल की जगह, यानी की बोडोलैंड को पहले जानने की जरुरत है. अगर आप नॉर्थईस्ट से नहीं हैं, तो शायद आपने यह नाम नहीं सुना हो और अगर बाई चांस सुन भी लिया है, तो ज़्यादा पॉसिबिलिटी इस बात की है कि वो किसी अच्छी वजह से शायद ही सुना हो! जिस जगह दो-तीन डिकेड तक एक आर्म्ड रेबिलियन ने अपनी पकड़ बना कर रखी हो, उस जगह से किसी और खबर की उम्मीद क्या ही की जाए! पर अब ऐसा नहीं है — आर्म्स सर्रेंडर हो चुके हैं और रिबेल्स अब लोकल सरकार के साथ मिल कर रीजन में बेटर डेवलप्मेंट के लिए काम करते हैं।

 बोडोलैंड कहाँ है, क्या है और कैसे है, इन के बारे में एक ब्लॉग अंग्रेजी में लिखे हैं. वक़्त निकल कर पढ़ लीजियेगा।

बोडोलैंड, बहुत ही सिंपल सा नाम है और इसका मतलब भी उतना ही सिंपल है — “द लैंड दैट बिलोंग्स टू बोडोज़”। पर सवाल यह है कि आखिर बोडो लोग हैं कौन और “दी लैंड दैट बिलोंग्स टू बोडो पीपल” कहाँ हैं। बोडोलैंड को जनवरी 2020 तक ऑफ़िशियल बोडोलैंड टेरीटोरियल कॉउन्सिल या बी.टी.सी. के नाम से जाना जाता था. यह वेस्टर्न असम में ब्रह्मपुत्र नदी के मैदानों और भूटान की पहाड़ियों के बीच की तराई वाला इलाका है. जनवरी 2020 में सेंट्रल गॉवर्मेन्ट ऑफ़ इंडिया और बी.टी.सी के रिप्रेज़ेन्टेटिव के बीच एक समझौता हुआ और बोडोलैंड को नया नाम मिला — बी.टी.आर. यानी बोडोलैंड टेर्रीटोरियल रीजन। माननीय तत्कालीन प्रधान सेवक खुद आये थे कोकराझार, रूठों को मनाने।

इस शांति समझौते से पहले भी एक शांति समझौता हो चुका है. बोडोलैंड और सेंट्रल गॉवर्मेन्ट ऑफ इंडिया के बीच, 2003 में. तब वेस्टर्न असम के चार जिलों कोकराझार (Kokrajhar), बक्सा (Baksa), उदलगुरी (Udalguri) और चिरांग (Chirang) को मिला कर बोडो प्रादेशिक क्षेत्र ज़िला (Bodo Territorial Area District- BTAD) बनाया गया था। अब सेंट्रल गॉवर्मेन्ट को किसी शांति समझौते जैसी बात पर मनाना कोई ओवरनाइट काम तो है नहीं! बोडोलैंड में सरकार एक शांति समझौते पर मान गई, तो इसके पीछे चार दशक तक चला एक विद्रोह है. कहने को तो विद्रोह सिर्फ़ एक वर्ड से ज्यादा कुछ नहीं है, पर जब इसको किसी एस्टेब्लिशमेंट में इम्पलीमेंट किया जाता है, तो टेररिस्ट पैदा होते हैं। इस बारे में न एक बहुत ही फेमस स्लोगन है, किसने दिया वो तो हमें मालूम नहीं, पर अब जब दिया है तो हमने हक़ से ले लिया, तो स्लोगन कुछ ऐसे है- ‘One man’s terrorist is another man’s freedom fighter’..

अगर ऐसा है तो क्या फ्रीडम फाइटर और टेररिस्ट में बिल्कुल भी फ़र्क़ नहीं है क्या? हर फ्रीडम फाइटर एक टेररिस्ट है पर हर टेररिस्ट एक फ्रीडम फाइटर तो नहीं हो सकता न ? इसको अपने हिंदुस्तानी रेफरेंस में देखें तो सरदार भगत सिंह और उनके तमाम साथियों को ब्रिटिश सरकार ने टेररिस्ट घोषित कर रखा था, जबकि न सिर्फ आज का बल्कि उस वक़्त की आवाम भी उनको देशभक्त कहती थी. ब्रिटिश राज के खिलाफ हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए लड़ने वालों में उनका नाम बड़े ही रेस्पेक्ट से लिया जाता था। गांधी जी के उनके बारे में क्या विचार थे वो एक अलग डिस्कशन है, फिर कभी चर्चा करेंगे उस पर। आप यह सोच रहें होंगे कि हम बोडोलैंड बात करते करते कहाँ रेवोलुशन में घुस गए। आपको बता दें कि बोडोलैंड की कोई भी बात विद्रोह, क्रांति, फ्रीडम फाइटर, टेररिज्म की बात के बिना पूरी नहीं हो सकती है।

चलिए  छोड़िये जाने दीजिये, बहुत ज्यादा पोलिटिकल हो रहे हैं हम, वापिस आते हैं अपने किस्से पर। 

हम आपको एक ख्वाब के सच होने की कहानी सुनाने का वादा करके लाये थे, पर हमने आपको यह नहीं बताया था की ख्वाब क्या था. हर ख्वाब से पहले एक सवाल जरूर होता है, और यहाँ इस ख्वाब से पहले सवाल यह था कि किसी जगह के रिसोर्सेज पर पहला हक़ किसका होता है? जितना ही सब्जेक्टिव यह सवाल है उतना ही सब्जेक्टिव इसका जवाब भी. पर सवाल भले कितना ही सब्जेक्टिव क्यों न हो जवाब तो आना ही चाहिए। हमें लगता है की रिसोर्सेज पर पहला हक़ होता है उनका जिनका लाइवलीहुड और सर्वाइवल इन रिसोर्सेज पर डिपेंड करते हैं. जब यह बात जंगलों के रेफ़्रेन्स में की जाए तो उन पर सबसे पहला हक़ तो जानवरों का होता है. पर शायद हम अभी इतने इवॉल्व नहीं हुए हैं कि जानवरों के रिसोर्सेज की बात करें और उनके बाद रिसोर्सेज पर हक़ होता है ट्राइबल्स का।

बोडोलैंड के मामले में भी यही हुआ. जब वहां के ट्राइबल लोगों ने अपने जंगलों और उनके रिसोर्सेज के सेंट्रलाइज़ेशन की बजाय लोकलाइज़ेशन की बात कही तो वही, हिस्ट्री रिपीटेड इटसेल्फ। गोवेर्मेंट के सामने, यहाँ यह बात जरूरी है कि गोवेर्मेंट के सामने, गोवेर्मेंट के खिलाफ नहीं, आवाज़ उठाने वाले लोग टेररिस्ट घोषित कर दिए गए थे. फिर जब लेबल मिल ही गया था तो ट्राइबल के एक धड़े ने हथियारों का सहारा ले ही लिया। अगले तीन डिकेड तक चला एक खुनी खेल, जो २००३ के शांति समझौते के साथ खत्म हुआ। उसके बाद शुरू हुआ, जो बिगड़ गया था उसको वापिस बनाने का काम, रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ सोसाइटी एंड रिहैबिलिटेशन ऑफ़ इग्नोरएड। वो ख्वाब जो देखा गया था वो पूरा हुआ है या नहीं, वो तो जिन्होंने ख़्वाब देखा था उन्हें ही पता होगा। पर इतना तो हम समझ चुके कि अधूरा तो नहीं रहा था वो सपना। आख़िरकार तो बोडोलैंड के लोगों को उनकी जमीन पर पहला हक़ मिल गया था। 

अगर सिर्फ लिखने की ही बात है, तो हम अपने पैरों को पंख और आपके मन को पीस लिख सकते हैं! पर अभी हमारा मन ऐसा कुछ लिखने का नहीं है — अभी तो हमारे दिमाग में सिर्फ एक क़िस्सा ए दानाई ने घर बना रक्खा है। पर यह क़िस्सा शुरू करने से पहले आपके लिए यह जानना ज़रूरी है कि क़िस्सा ए दानाई आख़िर है क्या बला! तो कान लगा के ध्यान से देखिएगा – क़िस्सा ए दानाई में दो वर्ड्स हैं, पहला क़िस्सा, जिसका माने है किस्सा, कहानी या वृतांत; और दूसरा वर्ड है दानाई, जिसका मतलब होता है विज़डम! तो जी, इस बोडोलैंड वाली ट्रिप पर जिस विज़डम से हम जिए, ये उसी की बात है – क़िस्सा ए दानाई।

Dancing peacock in Manas National Park
इससे पहले कि हम शूर्पनखा की तरह हांडते – हांडते, राम और लक्ष्मण पर फ़िदा हो कर अपनी नाक कटवा लें, हम अपने क़िस्सा ए दानाई पर आ जाते हैं।

वैसे तो ऐसे ज्यादातर किस्सों की शुरुआत शराब की अधिकता से होती है, पर ये वाला क़िस्सा ए दानाई थोड़ा डिफरेंट है। अलग होने का मतलब यह कतई नहीं है कि पूरे क़िस्से में से शराब ग़ायब है — बस हमारा यह क़िस्सा शुरू शराब से नहीं होता। हमारा यह किस्सा शुरू होता सुबह से – इससे बेहतर सिनोनिम है क्या आपके पास शुरुआत के लिए? और हाँ, हमनें इस सुबह वाले दिन की रात को बॉनफ़ायर पर बैठे बैठे काफ़ी शराब पी थी। शराब ने ही बैठे बैठे यह प्लान बना लिया था कि आने वाली सुबह कैसी जाएगी!

Camp Fire in Manas National Park
कैंप फायर, स्माइलिंग टस्कर एलीफैंट कैंप


अभी हम हैं असम में, मानस नेशनल पार्क की साउथर्न बॉर्डर वाली तारबंदी के बिलकुल सामने, जहां एक स्माइलिंग टस्कर एलीफैंट कैंप एंड रिसोर्ट है. अभी हमारे साथ 13 और लोग हैं जिनमें से 11 तो हमारी तरह ही ब्लॉगिंग और फोटोग्राफ़ी करते हैं! बाक़ी दो हमारे होस्ट हैं — जावेद और गायत्री। “कल हम क्या क्या कर सकते हैं और कौन कौन कहाँ कहाँ चलेगा, फिर उस हिसाब से ही पूरा मैनेज किया जायेगा…” – बॉनफायर पर बैठे बैठे जावेद भाई ने घूमने की बात छेड़ दी। तो डिसाइड हुआ कि जो चीज़ हमें सुबह सबसे पहले करनी थी, वो थी एलीफैंट जंगल सफ़ारी! मानी हम लोग हाथी पर बैठ कर जंगल देखने जाएंगे!

भाई ज़ल्दी चलोगे, तो गेंडों की लड़ाई वड़ाई भी दिख जाए शायद! — रात में जब प्लान बन रहा था तो किसी भाई की जुबान पर सरस्वती बैठ गई! अब क्या है न कि अगर आप गैंडों को देखने जा रहे हैं तो आपको हाथी तो चढ़ना ही पड़ेगा। बात हुई कि सुबह पांच बजे उठना है — एलिफैंट सफ़ारी के लिए! इस बीच, हाथी की सवारी की बात पर, कुछ लोगों की मोरालिटी जाग गई और कुछ के 5 बजे उठने की बात सुनकर एडवेंचर बग ही सो गए!

Bawray Banjaray at Smiling Tuskar Elephant Camp
स्माइलिंग टस्कर एलीफैंट कैंप में, बोडोलैंड एम्बेसडर्स

बाकी चीज़ों में तो सब लोग साथ आ जाते पर यहाँ बात आ गई जानवरों के एक्सप्लॉयटेशन की! आजकल हम मिलेनियल्स न जाने क्या क्या ट्रेंड बना लेते हैं। वैसे एक तरीके से मार्केटिंग करने वाले लोग ही समाज चला रहे हैं आजकल। एक ट्रेंड जो ये चल रहा है कि जानवरों की सवारी करना क्रुएल्टी है, इस पर हमने कभी बैठ कर तो सोचा ही नहीं! हालांकि अब देखिए, ये तो ट्रिप ट्रिप की बात है – कहीं ऐसे ही बैठे बैठे दो मिनट ज़्यादा सोच लिया और बात कुछ हद तक समझ आ गई. इसकी डेफिनेशन के हिसाब से जायेंगे तो फिर इतना डीप जाना पड़ेगा, जितनी डीप पाकिस्तान की इकॉनमी चीन के क़र्ज़ में है. इसलिए, हम सीधा सीधा अपना ओपिनियन बता देते हैं आपको — जिन जानवरों की सवारी हमने करनी है वो जानवर डोमेस्टिकेटेड हैं. मतलब वो जानवर जन्में भी इंसान के बीच और उनकी परवरिश भी इंसानों के बीच ही हुई है।

Elephant Safari Manas National Park
हाथी को नहलाने का अपना ही मज़ा है!

इस ओपिनियन को समझने के लिए रूरल रूट्स काम आ सकते हैं. पर अगर आप अपनी विलेज रूट्स को भुला चुके हैं, तो शायद हमारा लॉजिक आपको लेफ्ट द्वारा मोदी के विरोध जैसा जहर लगेगा! देखिए, गाँव में हमारे घर पर जब गाय, ऊंटनी  या बकरी बच्चा देती है न, तब वैसा ही माहौल होता है जैसा घर में किसी औरत के माँ बनने पर होता है। अगर आप को अब भी गाँव वाला लॉजिक समझ में नहीं आ रहा है, तो शहरी लॉजिक से समझ लो — आपने एक कुतिया पाल रखी है और उसने 5-7 पिल्लों को पैदा किया है, तो आप क्या फील करते हैं? बस वही बात है!

लोग डोमेस्टिकेशन की डेफिनेशन बनाने में लग गए हैं! हमारे लिए डोमेस्टिकेशन का मतलब है उस जानवर का घर का सदस्य बन जाना! और, घर के हर सदस्य की कुछ ज़िम्मेदारियाँ और कुछ अधिकार होते हैं! तो ये हाथी उन घरों का हिस्सा हैं और उनको भी यह घर हासिल हैं। अब हाथी तो ठहरा हाथी — वो कुत्ते जितना तो खायेगा नहीं! इसलिए ज़रूरी है कि वो अपने खाने के इंतज़ाम के लिए किसी पर पूरी तरह डिपेंडेंट न रहे और अपने खाने का कुछ जुगाड़ खुद भी करें। इसी लॉजिक के कारण हमें जानवरों की सवारी में कोई प्रॉब्लम नहीं होती। अपने को तो ये लगता है कि हम ही जंगल में इन्हें चराने ले गए. वैसे, एनिमल क्रुएल्टी के ट्रेंड के हिसाब से देखें तो, आप अपनी स्कूल और कॉलेज की फ़ीस अगर अपने माँ बाप से लेते थे, तो वो भी उन पर एक क़िस्म की ज़्यादती ही थी. इसलिए इस मॉरेलिटी के लेक्चर को राम राम बोलते हुए आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि बोडोलैंड देखने का क्या प्लान बना और जो प्लान बना क्या वो सच में इम्प्लीमेंट हुआ भी कि नहीं।

Elephant bathing Manas National Park
हाथी चले बाज़ार, कुत्ते भौंके हजार

जावेद भाई और गायत्री जी इस ट्रिप पर हमारे होस्ट थे. उनके अलावा हम पांच लौंडों का सफ़ारी पर जाने का सीन बन गया। बॉनफायर की लकड़ी के साथ जब अंगूर का पानी और भोले की बूटी का एक रात का कोटा खत्म हुआ, तो हम सब खाने पर लपके और खाना खाकर सो गए। शहर में जब होते हैं तो सुबह 9 बजे उठने के लिए भी दो तीन दर्जन अलार्म लगाने पड़ते हैं. पर जंगलों और पहाड़ों के करीब हमारी बायोलॉजिकल क्लॉक एकदम दुरुस्त काम करती है — सूरज के साथ साथ हम भी उठ जाते हैं, इर्रेस्पेक्टिव ऑफ़ द अमाउंट ऑफ़ टोक्सिकेशन वी हैड। हम सुबह 5 बजे तक तैयार हो कर टेंट के बाहर आ गए कि सबसे पहले सूरज के दर्शन करेंगे! पर कल के अँधेरे में टेंट की दिशा और दशा का कोई आईडिया ही नहीं लगा था. सुबह उठे, तो पता चला कि हम वेस्ट फेसिंग हैं, मतलब सूरज हमारे पिछवाड़े उगा है. तो हमने सामने वाले चाय के बागानों से ही अपना दिल बहलाने की कोशिश की और फ़िर करने लगे इंतज़ार। हमारे साथ टेंट में थे अपने देव भाई — इनको सोने की थोड़ी तकलीफ हो रखी थी, सो इनका ऑर्डर था — “जब सब के सब इकठ्ठे हो जाएं, उससे 5 मिनट पहले जाग देना बस! जल्दी से निबट कर निकल लेंगे!

Sunrise at Manas National Park Clicked by Bawray Banjaray
मानस नेशनल पार्क का सनराइज

वैसे तो हम सब टेंट में जा के उनके कानों में भोंपूं बजा सकते थे पर जैसे ही हमने कुर्सी पर तशरीफ़ रखी, बाजू वाले टेंट से केरल वाले प्रेम भाई बाहर आ गए. हमने टेंट के आगे लगी कुर्सियों पर बैठ थोड़ी सी घास घिसी — उम्मीद ये थी कि किचन का कोई स्टाफ़ जग जाए! चाय एक बेहद ज़रूरी द्रव्य है इस घिसने की प्रक्रिया में!

सब को उठते उठते और तैयार होते होते 6 बज चुके थे! चाय पी के हम निकल लिए मानस नेशनल पार्क के एंट्री गेट की ओर. वैसे तो मौसम गर्लफ्रेंड का हाथ पकड़ के चलने जैसा हो रखा था, पर पैदल चलने का प्लान कैंसिल करके हम ने जिप्सी चालू करवाई — अब सरकारी कामों का यही तो फायदा है, आपको संसांधनों की कोई कमी नहीं रहती। अब ये आप पर है कि आप उनका कितना बेहतर इस्तेमाल कर पाते हो.

Manas National Park Entry Point
मानस नेशनल पार्क का बायोडाटा

हम पहुंचे पार्क के गेट पर और ‘ज़रूरी औपचारिकताएं’ पूरी की. अंदर घुसते ही हमें मानस नेशनल पार्क का रिज़्यूमे मिल गया। अब इतना बड़ा पार्क है, तो रिज्यूमे छोटा कैसे हो सकता था! एकदम मॉडर्न स्टाइल में डिज़ाइन किया गया — सबसे पहले तो नेशनल पार्क का एक नक्शा था, माने रिज़्यूमे पर होने वाली आपकी फ़ोटो (अगर आप सोच रहे हैं कि रिज़्यूमे में फ़ोटो नहीं होती, तो बावा आप, शहंशाह अकबर के ज़माने में तो नौकरी नहीं ढूंढ रहे), नक़्शे के अलावा उस विशाल रिज़्यूमे में मानस नेशनल पार्क की अब तक की सारी अचीवमेंट्स को मेंशन कर रखा था. वैसे हमने मानस नेशनल पार्क की इन सारी अचीवमेंट्स के अलावा यहाँ आने, रहने, खाने और नहाने की सारी प्लानिंग पर एक ब्लॉग अलग से लिखा है।

rhinos in manas national park
मम्मा राइनो

अगर आपने अभी तक वो ब्लॉग नहीं पढ़ा है, तो ज़रा पढ़ के आइये! तब तक हम भी थोड़ा सोचते हैं कि आगे कौन कौन सी चीज़ें आपको बताने लायक हैं और कौन कौन सी छुपाने लायक। वैसे कुछ छुपाने और बताने की वजह तो है हमारे पास. जब आप को एक्टिविटीज और एक्सप्रिएंसेस का ओवरडोज़ हो जाता है, तो आप समझ पाते हैं कि नेचर ने आपके सामने यह क्या नुमाइश लगा रखी है — मतलब आपकी डाइजेस्ट करने की जो लिमिट होती है न उससे कहीं ज़्यादा। इसके बाद जो हुआ उसपर हमें भी बिलकुल यकीन नहीं हो रहा था! नेचर हम पर इतनी मेहरबान कैसे हो सकता था। नेचर हो रहा था या हो रही थी, इस बारे में भी विद्वानों में काफी मतभेद हैं. चूँकि मतभेद विद्वानों के हैं, इसलिए हम इस डिस्कशन कम आर्गुमेंट में नहीं पड़ेंगे। अब नेशनल पार्क के अंदर घुसने के बाद क्या हुआ वो आगे बताते हैं, अभी चाय गरम हैं, कहीं ठंडी न हो जाएँ।

क्रमशः

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