अनंत की पुकार | किस्सा नंबर 5: और क्या ही चाहिए!

क़िस्सा नंबर 4: शिव, गंगा, दिया, और चाँद तो फिर है ही!

बाहर मेन रोड पर पीले रंग की दीवार के एंट्रेंस पर लिखा है, “पुरुषोत्तम नन्द महाराज आश्रम, वशिष्ट गुहा आश्रम” ऐसा ही कुछ। बाजू में ऐक्टिवा खड़ी कर के सीढ़ियाँ उतरना शुरू किया, और उतरते उतरते गंगा किनारे बैठने का ख़याल छलांग मार रहा था, गुफ़ा के दर्शन के साथ साथ। कुछ सीढ़ियाँ उतरते ही, राइट साइड में एक साधू बैठे थे, नज़रें मिलीं, और प्रणाम किया, उनकी स्माइल मानो आशीर्वाद बरसा रही हो। उसके आगे की उतराई में कुछ प्राणी और मिले, इन्क्लूडिंग गाय। नीचे पहुँचते एक अंकिल से पूछा “गुफ़ा किधर है, किधर है गुफ़ा”, जिस पर उन्होंने डरते हुए कहा, “मंदिर से लेफ़्ट ले लो”। मंदिर एक नज़र निहार कर अपुन गुफ़ा की तरफ़ बढ़े, और जो गुफ़ा दिखी, बोर्ड था “अरुंधति गुफ़ा”। अच्छा वो जो मंदिर है न, वो वशिष्ट गुफ़ा पर ही बनाया है। लोगों का मानना है कि ऋषि वशिष्ट यहाँ ध्यान करते थे, और उनकी पत्नी अरुंधति अपनी गुफ़ा में। तो मैं बाय चांस सिर्फ़ अरुंधति गुफ़ा में ही भीतर गयी, छोटी सी है। यहाँ पर गंगा की पुकार ज़्यादा लाउड थी मेरे भीतर, तो कुछ ही मिनटों में गंगा किनारे निकल गई। 

अरुंधति गुफ़ा

कुछ घंटे वहीँ बैठे-बैठे फुर्र हो गए। इस बीच मैंने कुछ नहीं किया, सिवाय कुछ एक फ़ोटू निकालने के। वो भी तब जब चिड़िया लोग ने जलवे दिखा कर मजबूर कर दिया कैमरा निकालने को। गंगा एकदम शांत है यहाँ, पर थोड़ी ही आगे उसकी आवाज़ तेज़ है, जो मेरे कानों पर पड़ रही है। लेफ़्ट में सूर्य देव किरणों से छू रहे, मुझे भी और गंगा को भी। सामने दूसरी पार पेड़ ही पेड़ हैं, जंगल है। उन्हीं में से एक छोटा पेड़ कुछ इस तरह बना हुआ है और हिल रहा है जैसे छोटा हाथी अपने कान हिला रहा हो। कुछ देर तो मुझे यही लगा कि कोई ऐसा ही है। पर कुछ देर में उस पेड़ ने किसी और का रूप ले लिया। सूरज की किरणे गंगा की लहरों पर पड़ कर कैसे कैसे रंग बनाती हैं ना!

टश्नी स्वांग वाली

चिड़िया लोग नज़दीक के पत्थरों के पीछे से स्वांग दिखा रही हैं। इतने में एक राफ्टिंग वाली बोट गुज़रती है। ट्रेनर सर अच्छे से बता/सिखा रहे लड़के-लड़की लोग को। इसके बाद नदी के बीच पत्थर पर एक चिड़िया ध्यान-मग्न बैठी है। उसको देखती रही, और एक फ़ोटू क्लिक करते ही वो गायब हो गई। कभी कभी चीज़ें इतनी जादुई होती हैं कि क्या कहें!

ध्यान – मग्न चिड़िया

एक कॉल लगाया देहरादून, “मैं ऋषिकेश में हूँ, वहाँ आ सकते हैं?”, “हाँ आ जाओ”, के बाद तय हुआ कि अगला स्टॉप देहरादून होगा। वैसे तो अपुन देहरादून, कुछ-एक बार गए हैं, पर इस पर्टिकुलर जगह (फ़ैमिली रिलेटेड) कभी जाना नहीं हुआ। तो उठ कर रोड की ओर जाने लगी तो चमत्कार हुआ। जिन पत्थरों पर से चल कर यहाँ आई ही थी, उनके रंग और रंगीन हो गए। माने, रंग ही रंग दिखे सब जगह। उनके बीच एक नन्हा सा पौधा दिखा, जो था तो ऊँगली भर पर उसमें फूल और फल दोनों थे। और भी कुछ फूल देखे, पीले, मैजेंटा, पलपल (मेरी माँ का दिया नाम)। यहाँ आश्रम में लोग ध्यान करने आते हैं। पर मैं ऐसा कुछ न कर पाई। पहाड़ में नदी दिखते ही मैं ऐसी बेहाल बेहोश हो जाती हूँ कि कुछ और दीखता ही नहीं, चाहे कितना भी छोटा बड़ा, महत्वपूर्ण कुछ हो। इस बार गंगा मैया ने ऐसा कुछ किया कि उसे छू भी न पाई। एक बूँद भी नहीं। बस देखने में ही सारा वक़्त बीता। 

तस्वीर से काफ़ी गहरा रंग है इनका

जाते वक़्त साधू बाबा को फिर से नमन किया, और उन्होंने उसी मुस्कान के साथ आशीर्वाद दिया। कुछ लोगों का आशीर्वाद भीतर तक जाता है, और आपको पता होता है। रोड पर, पानी पी कर, नक़ाब लपेट कर, म्यूज़िक ऑन कर के, देहरादून की ओर चलना शुरू। यहाँ से दो रास्ते जाते हैं देहरादून, एक तो ऋषिकेश के नीचे की तरफ़ से, दूसरा (जिसे बाई-पास कहते हैं) वो ऊपर की तरफ़ से जाता है, टिहरी वाली रोड से। तो अपने को एडवेंचर चाहिए ही था, तो टिहरी वाला रास्ता तो बनता ही है। (उल्लू पकाया ! ये रास्ता भी बाई चांस पकड़ में आया)। इस रास्ते पर अपुन ने सही मायने में पहाड़ों पर दुपहिया चलाना सीखा। उफ़्फ़ जो मज़ा है!

अच्छा, इन शार्ट एक नोट लिख रही: हमारे परिवार वालों का कहना है कि ये परिवार गुरु वशिष्ट, जो कि राम (वही अयोध्या वाले) के भी गुरु थे, उनके ही वंश या शिष्य जन, या समथिंग लाइक दैट से जुड़ा हुआ है। ये सब का तो पता नहीं, पर इस जगह आ कर अपुन को कुछ कुछ नहीं, भोत कुछ हुआ। जगह ही ऐसी है। कोई भी नहीं, यहाँ तक कि मैं भी नहीं।

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