अनंत की पुकार | क़िस्सा नंबर 3: तेरा ही गीत, तेरा संगीत चहुँ ओर

पढ़ें क़िस्सा नंबर 2: सवा घंटे वाला चाय ब्रेक

अपर गंगा कैनाल रोड पर आगे का नज़ारा और सरसराती हवा ने माहौल एकदम मस्त कर दिया राइड का। राइट साइड (ईस्ट) में सूर्योदय हो रहा था और लेफ़्ट साइड में नहर किनारे लहराते पेड़। अपने को नॉर्थ की तरफ़ निकलने का है। खतौली से लेफ़्ट गए, कुछ-एक गाँवों से निकले, और फिर आ गया दिल्ली-हरिद्वार हाइवे। मक्खन है जी सड़क। अब तक के रास्ते पर DL नंबर की भरमार है, लगता है आधी दिल्ली हरिद्वार में मिलेगी। करीब दो घंटे में हरिद्वार से पहले एक ढाबे पर दूसरा चाय ब्रेक लिया। सूरज अपने चरम पर था, सो अपुन ने इकलौती जैकेट उतार कर ऐक्टिवा की तिजोरी में रख दी।

मक्खन हाईवे और रूमानी मौसम: कॉल्स फ़ॉर अ चाय


“सर एक चाय देना कुल्हड़ में” बोल कर टेबल पर बैठी तो बाजू में झूले पर बैठी एक मोहतरमा से आँखें मिलीं। ओहो क्या मुस्कराहट थी यार! ऐसे चेहरों पर खट्ट से मर जाते हैं हम तो। फिर उनके पुरुष साथी आ गए, और आँखों की वार्तालाप समाप्त।
शानदार दमदार चाय पीते हुए एक ख़ास व्यक्ति की याद आई और उसको मैसेज टिका दिया “लोकेशन भेजो, एक घंटे में आ रही”. सामने वाले को कम से कम हज़ार वॉट का झटका लगा जिसको सँभालते हुए उसने कहा “अबे मैं हरिद्वार में हूँ”, और तुरंत कॉल कर के मेरे ऐसे डरावने मैसेज का प्रोयजन पूछा गया। “अरे मैं हरिद्वार के बाहर ही हूँ, फ़्री हो तो दर्शन दो देवी”। “शिवालिक नगर आ जाओ अब जब आ ही गयी हो तो” जिसका सबटेक्स्ट था “सुबह सुबह पागलपंती कर रही लड़की, सारा मूड ही ऑफ कर दिया”। लोकेशन पर पहुँचने पर तो सरप्राइज का धप्पा अपने लिए रेडी था। मैडम तो आईं मिलने, सर और हमारे छोटे कन्हैया भी साथ थे, जिनको देखते ही चेहरा खिल गया। इंट्रोडक्शन: मैम हमारी संगीत गुरु हैं, जिन्होंने कुछ साल पहले बेसुरे गलों में से राग मल्हार निकलवा दिए। उनकी गाई हुई कुछ बंदिशें आज भी अपुन के फ़ोन में लूप पर बजती हैं। अच्छा आज पता चला कि मैम के बेटे, जिसको हम कृष्णा बुलाते रहे हैं, उसका दूसरा नाम सिद्धार्थ भी है। मज़ा ही आ गया सुन कर। मैम कहती हैं कि जिस राह उसको जचे, उस राह जाए, कृष्णा या सिद्धार्थ। वैसे लक्षण तो पूरे कृष्ण वाले हैं लड़के में।

ख़ैर, इन लोगों के साथ एक स्पेशल मिठाई की दुकान पर नाश्ता किया, छोले-समोसे और गुलाब जामुन। दो पीस समोसे बोल तो दिए, पर दूसरा शुरू होने तक ही पेट ने गालियाँ देना शुरू कर दिया। वो यूँ कि एक तो मेरे पेट की कैपेसिटी भोत कम है, नींद के अभाव में और भी कम हो जाती है। पर अब चैलेंज ले लिया था तो जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं। “अरे महानुभावों चाय तो पिला दो” और मैम ने एक मस्त जगह सजेस्ट कर दी अपुन के चाय के नशे को सराहते हुए। सुरेश्वरी देवी मंदिर, जो कि राजाजी नेशनल पार्क में आता है। हमें यहाँ छोड़ कर, सर अपने काम को निकल लिए। राजाजी नेशनल पार्क से अपनी पहली मुलाक़ात यहीं हुई। सबसे पहले बाहर जो झोपड़ीनुमा कमरा है, उसमें बैठ कर एक और जानदार चाय का भोग किया गया। कृष्णा ने एक मैगी पेल ली, “आपको नहीं दूँगा, सिर्फ़ मेरी है” बोल कर मज़े लेते हुए। और हमने उसको चिढ़ाया कुछ गाने गा कर, जिनको सुन कर असंख्य चिड़िया वहाँ आ बैठीं। (जस्ट किडिंग: चिड़िया नमकीन खाने अक्सर वहाँ आ जाती हैं)। थोड़ी मैगी भी ले गईं कृष्णा से। मज़ा आया, पर मैं चिड़िया को बोल रही “दीदी एक स्टिल तो दे दो, इतना भी क्या कुदक फुदक रही”, जिस पर मुँह चिढ़ा कर कोने में जा कर छिप गई दीदी। 

ऐटिट्यूड देख रहे हो लड़की का

अब हम तीनों ऐक्टिवा पर थोड़ी अंदर तक गए, ऐक्टिवा पार्क की, और मंदिर दर्शन को जूते उतारे। यार इतनी धूप में टाइलों पर चढ़ना पड़ता है तो चढ़ाई वढ़ाई सब भूल जाती है। फ़टाफ़ट टॉप पे पहुँच गए। हाँ हाँ बीस मीटर ही हाइट थी, पर जलन तो जलन होती है ना। अच्छा यहाँ पर सभी उम्र के प्राणी पाए जाते हैं, सेल्फ़ी लेते हुए। एक आठ महीने की बच्ची भी हमसे अच्छी सेल्फ़ी ले रही थी। अपुन को फ़ील आ गया यार जंगल दिखते ही, और ध्यान करने को आँखें बंद कर लीं। “अरे मम्मी रुक जा, ले रहा तेरी फ़ोटो”, “सुनो ना, यहाँ से अच्छा बैकग्राउंड आएगा”, “देख इसे कहाँ जा रही, चैन से बैठ जा”, – जैसे मधुर शब्दों से आँखें खुल गयीं। मैम और मैंने मामला समझते हुए तय किया कि बस निकल लो अब इधर से। और नीचे आते आते हमारा गुनगुनाना चालू हो गया। स्कीम बना ही रहे थे, कि मंदिर में कौन सी लोकेशन पर बैठने से ज़्यादा कमाई होगी, कि पास से गुज़रते हुए लोगों ने सब प्लान सुन लिया और खूब जगहँसाई हुई हमारी। पर ख़ुद का होंसला बढ़ाते हुए, एक मस्त स्पॉट ढूंढ कर हम दोनों ने जुगलबंदी कर ही ली, जिसमें शामिल गाने थे: “कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे”, “तुम बिन पिया”, वगैरह वगैरह। भई ट्रेन शुरू होती है तो स्टेशन का हिसाब ही न रहता है। लगे हाथों कृष्णा ने भी एक शानदार परफॉरमेंस दे ही दी, जिसमें से मुझे बस ये याद है “अबड़ जबड़ ला ला बड़बड़ू”, समथिंग लाइक दिस।

स्त्री के संघर्ष बहुत बड़े नहीं होते। समाज में क्या अपेक्षाएं और अवहेलना होती आई हैं, इस पहलू को लेकर काफ़ी कुछ सुना, थोड़ा कहा गया। मुझे सुनना पसंद है, इसलिए नहीं कि कुछ सीखने को मिलता है, पर इसलिए कि कहने वाला कहना चाहता है। सुनने वाले क्षणों में, कोई अपना पराया नहीं रह जाता मेरे लिए, सब में ऐसी लौ सी चमकती, जलती, झिलमिलाती, संभलती सी दिखती है जिससे काफ़ी देर तक समय का ओर छोर ही नहीं रह जाता। और बीच बीच में संगीत में डुबकी लग जाए तो ओफ़्फ़ो !
ये सब नौटंकी कर के हम बाहर आ गए, चाय से गले को आराम दिया और आत्मा को भी। इस बार, चिड़िया लोग की फ़ोटू निकाल ही ली अपुन ने, आईं बड़ी ऐटीट्यूड वाली। यहाँ से भी सब को, माने, सर, मैम, कृष्णा सर (जो कहते रहे, कल फिर आना), और चाय वाले दादा को प्रणाम कर के आगे बढ़ गए। 

क्या उसके गुस्से में ही प्यार है ?

अच्छा यहाँ पर नोटिस हुआ कि हाथ कोयले से काले हो गए, और ऐक्टिवा के लिए फ़्रेश कपड़ा लेना है। तो अगला स्टॉप अपने आप ही “हरिद्वार घाट ((मार्किट)” हो गया, नॉट ऑन पर्पस, जस्ट बाय चांस।

मार्किट में एक दुकान पर अंकिल जी से पूछा कि ये दो सामान कहाँ मिलेंगे, और एटीएम का पता भी। उनके बताए अनुसार कैनरा बैंक एटीएम पर गए- असफ़ल प्रयास। फिर पूछते पूछते चार और एटीएम का ट्रिप लगा लिया पर उस दिन शायद एटीएम की हड़ताल थी। वापस अंकिल के पास आयी, तो रस्ते में एक भले मानुष ने पी.एन.बी एटीएम की ओर इशारा किया, जो कि सबसे पास था, और पैसे भी देता था। अपने को हर की पौड़ी तक एटीएम की तलाश ने घुमा दिया, ये भी बढ़िया रहा। लोकल मार्किट देखने का मज़ा ही कुछ और है। अंकिल ने खुल्ले पैसे दिए, और उनके पड़ोसी भाई जी ने असली नोट पहचानने की टिप- हरे रंग की पट्टी नीली हो जाती है टेढ़ा करने पर। मैं अपने को टेढ़ा करने ही वाली थी कि भाईजी ने नोट टेढ़ा कर के डेमो दिया, और दिल्ली से आने पर बधाई, सराहना, वगैरह वगैरह। हरिद्वार घाट के पुल पर एक मस्त रुमाल लिया ऐक्टिवा के लिए, पर हाथों के लिए लिबास न मिला कहीं भी। अब ऋषिकेश में देखेंगे, कह कर थोड़ी ही आगे बढ़ी कि विराट शिव प्रतिमा लेफ़्ट में पड़ी। भीड़ इतनी ज़्यादा थी, कि एक भी फ़ोटू न ले पाई, और “वापसी में” कह कर शिव को बाय बोला। अच्छा यहाँ से काफ़ी आगे तक महा-कुम्भ की तैयारी ज़ोरों शोरों पर चालू आहे। ये बड़े-बड़े पाण्डाल, विश्राम गृह वगैरह बन चुके हैं, और काफ़ी का असला बारूद रखा हुआ है। कुम्भ में आम जनता की भीड़ का सीन अपने को अभी तक समझ नहीं आया है, पर वो कोई बात नहीं। 

सूने घाट “महा कुम्भ” की प्रतीक्षा में (circa: कोविड टाइम्स)

कुछ ही दूर चलने पर ऋषिकेश वाले मेन रोड/हाइवे पर पहुँच गई। इस बात का एहसास इतना गहरा और इतनी तेज़ी से हुआ कि अपुन खल्लास, D U D- डेड!

पहाड़ों ने, जंगल के पेड़ों ने, मुझ से लिपटती ठंडी हवाओं ने, जाने कैसे अपना बना लिया, कैसा गीत गाया, कि आँखों से झरने बहने लगे, और ऐक्टिवा चलाते चलाते मैंने अपने रोने की दहाड़ें सुनी। ये सिलसिला तब तक रहा जब तक मैं लक्ष्मण-झूला ना पहुँच गई। कभी ऐसा होता है आपके साथ, जब आपका अस्तित्व ख़त्म हो जाए और ख़ुद के होने का नया सा, पहला सा, एहसास हो? मानो जन्मों से किसी ने उस क्षण की प्रतीक्षा की हो। लो, हो गई न धत्त तेरी ! ऐसे आँसुओं को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता, लाखों असफ़ल प्रयास किए हैं मैंने। 

इस शाही स्वागत के बाद देवभूमि में गन्ने का रस पिया गया। सर ने बताया कि गन्ना मेरठ से आता है। और फिर उनके दो छोटे बच्चों ने उनका अटेन्शन डिमांड किया। इसके बाद गड्डी पार्क कीत्ती गई लक्ष्मण झूला के बाजू में।

शाही स्वागत ख़ुद का
एन-रुट ऋषिकेश; उन्नासी गालियाँ तो पड़ी होंगी बीच सड़क पर खड़े हो इसकी फोटू निकालने पर. #प्राउड_इंडियन
देख लो नमकीन-खोर को. #बोनस_फोटू
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